Tuesday, July 5, 2022

कोरोना : भारतीय डॉक्टरों को अमेरिका के ग्रीन कार्ड बैन कितनी मुश्किल ?

( इनपुट बीबीसी से )

अमरीका में कोरोना वायरस से संक्रमित मरीज़ों की संख्या आठ लाख से ज़्यादा हो गई है. इस महामारी के कारण अमरीका की स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव बढ़ गया है. लेकिन, अमरीका में काम कर रहे कई विदेशी स्वास्थ्यकर्मियों की शिकायत है कि वीज़ा के सख़्त नियम उन्हें इस महामारी से निपटने में अपना योगदान देने की राह में बाधा बन गए हैं.

डॉक्टर मिर्ज़ा बेग – फाइल फोटो

डॉक्टर अभिनव सिंह एक फिज़िशियन हैं. डॉक्टर अभिनव, नींद से जुड़े तंत्रिका विज्ञान में विशेषज्ञ हैं. कहने का मतलब ये है कि वो अच्छी नींद और अच्छी सेहत के बीच के संबंध का पता लगाते हैं. वहीं. डॉक्टर मिर्ज़ा बेग एक नेफ्रोलॉजिस्ट हैं. आसान ज़ुबान में कहें तो उन्हें गुर्दों से जुड़ी बीमारियों के इलाज में महारत हासिल है. डॉक्टर अभिनव और डॉक्टर मिर्ज़ा बेग, दोनों का ताल्लुक़ भारत से है. वो इस समय अमरीका के H-1B वीज़ा के तहत काम कर रहे हैं.

डॉक्टर अभिनव – फाइल फोटो

दोनों ही चाहते हैं कि वो अमरीका के कोरोना वायरस से सबसे बुरी तरह प्रभावित इलाक़ों में जाएं, ताकि इस महामारी से जूझ रहे डॉक्टरों और नर्सों की मदद कर सकें. और इस ख़तरनाक वायरस को परास्त कर सकें. कोरोना वायरस से अमरीका का न्यूयॉर्क राज्य सबसे बुरी तरह प्रभावित है. इस समय न्यूयॉर्क इस महामारी का मुख्य केंद्र बना हुआ है. यहाँ कोरोना से 20 हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है.

डॉक्टर अभिनव की क्लिनिक अमरीका के इंडियानापोलिस इलाक़े में है.

उन्होंने फ़ोन पर बताया, ”हमारे जैसे बेहद क़ाबिल डॉक्टर न्यूयॉर्क और इस वायरस से बुरी तरह प्रभावित अन्य इलाक़ों में जाना चाहते हैं. ताकि वहां महामारी से लड़ रहे स्वास्थ्य कर्मियों की मदद कर सकें. लेकिन, हम वहां नहीं जा सकते. क्योंकि इसका ये मतलब होगा कि हमारी नौकरी की जगह बदल जाएगी. और ये अमरीका के H-1B वीज़ा के नियमों के ख़िलाफ़ होगा.”

दूसरी ओर डॉक्टर अभिनव कहते हैं, ”H-1B वीज़ा नौकरी देने वाली कंपनी के हिसाब से होता है. इसलिए मैं किसी ख़ास जगह पर किसी ख़ास मालिक के लिए ही काम कर सकता हूं. अगर मैं नौकरी बदलता हूं, तो मेरे नए मालिक को मेरे लिए नया वीज़ा लेना होगा.’

वहीं, डॉक्टर बेग़ कहते हैं, ‘हम इस महामारी से निपटने में अमरीका की मदद कर सकते थे. लेकिन अभी हम ऐसा नहीं कर पा रहे हैं.’

वीज़ा की चुनौतियां

जानकार कहते हैं कि अमरीका के H-1B वीज़ा के नियम बेहद सख़्त हैं. इनके मुताबिक़ कोई भी कर्मचारी, एक ही कंपनी के किसी और दफ़्तर या कारखाने में भी तब तक काम नहीं कर सकता, जब तक उन्हें बदला ना जाए.

H-1B वीज़ा उन्हीं लोगों को दिया जाता है जिनके पास ख़ास हुनर होता है. ऐसे लोग अमरीका में अस्थायी तौर पर काम कर सकते हैं. इस वीज़ा को हर तीन साल बाद फिर से जारी कराना पड़ता है. अमरीका हर साल केवल 65 हज़ार H-1B वीज़ा जारी करता है.

अमेरिकी सरकार की एक रिपोर्ट  कहती है कि, वित्तीय वर्ष 2017 में जितने H-1B वीज़ा जारी किए गए थे, उनमें से 75.6 फ़ीसदी का लाभ भारतीय नागरिकों को मिला था. H-1B से पेशेवर लोगों को ये फ़ायदा भी होता है कि अगर उनकी कंपनियां या मालिक इसकी इजाज़त देते हैं, तो वो अमरीका में क़ानूनी रूप से स्थायी निवास के लिए भी अर्ज़ी दे सकते हैं. इसे ग्रीन कार्ड कहा जाता है. इसी वजह से अमरीका के H-1B की भारी मांग है. लेकिन, ये वीज़ा बहुत सारी शर्तों के साथ मिलते हैं.

डॉक्टर अभिनव कहते हैं, ‘अगर अमरीका में रहते हुए किसी हादसे में मेरी मौत हो जाती है. या किसी और कारण से मैं काम करने लायक़ नहीं बचता. तो, H-1B वीज़ा के मुताबिक़, मेरी पत्नी का अमेरिका में रहना ग़ैर क़ानूनी हो जाएगा. फिर उसे यहां ज़िंदगी के 18 बरस बिताने के बावजूद ये देश छोड़ कर जाना होगा. मैं हर रोज़ इस डर के साये में जीता हूं.’ अभिनव की ग्रीन कार्ड की अर्ज़ी 2012 से सरकार के पास लंबित है. डॉक्टर अभिनव ने अपना ग्रेजुएशन तो भारत में पूरा किया था. लेकिन इसके आगे पोस्ट ग्रेजुएट, रिसर्च और न्यूरोलॉजी में विशेषज्ञता की पढ़ाई उन्होंने अमरीका में की थी. डॉक्टर अभिनव, वर्ष 2012 से H-1B वीज़ा पर अमरीका में रह रहे हैं. अपने हालात पर बेबसी जताते हुए, अभिनव कहते हैं, ‘कई बार तो मुझे लगता है कि अपना बोरिया बिस्तर समेट कर मैं अपनी दादी के पास चला जाऊं. वो छत्तीसगढ़ में रहती हैं. वहां पर स्वास्थ्य की अच्छी सुविधाएं नहीं हैं. अच्छे डॉक्टर और क्लिनिक की भी कमी है.’

डॉक्टर अभिनव कहते हैं, ‘जब हम अमरीका आए थे, तो हमने सोचा था कि हम ऐसे देश में रहने जा रहे हैं, जहां सबको तरक़्क़ी के मौक़े और संसाधन मिलते हैं. जहां क़ाबिलियत का सम्मान होता है. लेकिन, यहां 18 बरस बिताने के बाद, ढेर सारी बड़ी-बड़ी डिग्रियां हासिल करने के बाद भी मुझे ये महसूस होता है कि मैं कतार में खड़ा हूं. और लाइन आगे बढ़ ही नहीं रही. ऐसा लगता है जैसे आपके कड़ी मेहनत करने का कोई मतलब नहीं,’

डॉक्टर मिर्ज़ा बेग़ भी वर्ष 2010 से ग्रीन कार्ड मिलने का इंतज़ार कर रहे हैं. वो कहते हैं कि, ‘हम एकदम टूट के कगार पर पहुंच चुके हैं.’ बेग़ जैसे डॉक्टर, कोविड-19 की महामारी से लड़ रहे अमरीका के लिए काफ़ी मददगार साबित होते. इसकी वजह ये है कि नया कोरोना वायरस गुर्दों को बहुत नुक़सान पहुंचाता है. और अमरीका में इस समय हाल ये है कि डायलिसिस के लिए डॉक्टरों और मशीनों की भी कमी महसूस की जा रही है.

अमरीका को मदद की दरकार है

अमेरिकी राष्ट्रपति : डोनाल्ड ट्रम्प – फाइल फोटो

अमरीका की संघीय स्वास्थ्य संस्था, सेंटर फॉर डिज़ीज़ कंट्रोल ऐंड प्रिवेंशन (CDC)ने ख़बर दी थी कि 9 अप्रैल तक 9 हज़ार से अधिक स्वास्थ्य कर्मियों को कोरोना वायरस का संक्रमण हो चुका है. साथ ही साथ सीडीसी (CDC) ने चेतावनी दी थी कि अभी बड़ी संख्या में स्वास्थ्य कर्मियों के इस वायरस का शिकार होने की आशंका है. अमरीका में रह रहे विदेशी डॉक्टरों को वीज़ा की सख़्त पाबंदियों के साथ-साथ हर राज्य के मेडिकल लाइसेंस के नियमों का भी पालन करना पड़ता है. ऐसे में उनका अमरीका में अस्थायी प्रवासी होना उनके तनाव और ज़िंदगी में अनिश्चितताओं को बढ़ा देता है.

अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ़ फिज़िशियन्स ऑफ़ इंडियन ओरिजिन (AAPI) द्वारा जारी एक बयान में कहा गया था, ‘कोविड-19 की महामारी के चलते बहुत से डॉक्टर कभी संक्रमण, तो कभी काम के अत्यधिक दबाव और कभी बीमारी के चलते मरीज़ों का इलाज नहीं कर पा रहे हैं. कई राज्य सरकारों की तरफ़ से ये अपील की गई है कि, ऐसे हालात में रिटायर हो चुके स्वास्थ्य कर्मी, डॉक्टरों और नर्सों की कमी को पूरा करने के लिए आगे आएं. उनके लाइसेंस की शर्तों में ढील दी जा रही है. राज्यों की तरफ़ से ऐसे डॉक्टरों के काम करने की राह में लगाए गए रोड़े हटाए जा रहे हैं. लेकिन, इनमें से कोई भी छूट उस समस्या का निदान नहीं कर पा रही है, जिसके अंतर्गत, स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े पेशेवर लोग अमरीका में होने के बावजूद इस महामारी के ख़िलाफ़ जंग में अपना योगदान नहीं दे पा रहे हैं. क्योंकि उन पर वीज़ा से जुड़ी तमाम पाबंदियां लगाई गई हैं.’

अमरीका में भारतीय मूल के डॉक्टरों की संस्था (AAPI) ने अपने बयान में आगे कहा, ‘काम करने में अक्षम होने और लोगों की मौत से रिक्तता आएगी. क्योंकि ये डॉक्टर अस्थायी आप्रवासी कामकाजी हैं. और जिनके अमरीका में रहने का केवल एक क़ानूनी आधार है और वो उनका काम है. कोरोना वायरस से लड़ रहे डॉक्टर जब अपने घर से काम पर निकलते हैं, तो उनके और उनके परिजनों के ज़ेहन में यही ख़याल रहता है.’

AAPI ने अपने बयान में आगे कहा कि, ‘ये डॉक्टर और उनके परिवार के सदस्य अगर इस महामारी के शिकार हो जाते हैं, तो भी उनके सिर से अपने देश वापस भेज दिए जाने का ख़तरा मंडराता रहता है.’ इस संस्था की मांग है कि कोरोना वायरस की महामारी से लड़ने के लिए डॉक्टरों को ग्रीन कार्ड दिया जाना चाहिए. AAPI के अनुसार ये ‘नेशनल इंटरेस्ट ग्रीन कार्ड’ महामारी का सामना करने में बहुत काम आएगा.

न्यूयॉर्क राज्य के गवर्नर ने देश भर में मौजूद सभी पेशेवर स्वास्थ्य कर्मियों से कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ जंग में मदद की अपील की थी. कई अमरीकी राज्यों के गवर्नरों ने स्वास्थ्यकर्मियों के काम करने के नियमों में कुछ ढील दी है. लेकिन, अभी भी विदेश में पढ़ कर अमरीका में काम कर रहे ऐसे पेशेवरों की क्षमताओं का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है.

ग्रीन कार्ड की अर्ज़ियों का ढेर लगा है

अमरीका में क़ानूनी तौर पर रहने का अधिकार चाहने वाले बहुत से विदेशी पेशेवर लोगों को ग्रीन कार्ड मिलने के लिए लंबा इंतज़ार करना पड़ता है. लेकिन, बड़े और ज़्यादा आबादी वाले देशों जैसे कि भारत और चीन के लोगों के लिए ये इंतज़ार बहुत लंबा होता है. इसके मुक़ाबले पाकिस्तान जैसे छोटे देशों के लोगों को अमरीकी ग्रीन कार्ड जल्दी मिल जाता है. ग्रीन कार्ड की अर्ज़ी देने वालों की संख्या के अनुपात में नहीं जारी किया जाता है. बल्कि, आप्रवासियों के मामले देखने वाली वक़ील एन बेडम्स कहती हैं कि ग्रीन कार्ड ये देख कर दिया जाता है कि अर्ज़ी देने वाला किस देश का रहने वाला है. और उस देश का ग्रीन कार्ड का हिस्सा कितना है.

इस समय अमरीका का ग्रीन कार्ड चाहने वालों की संख्या दस लाख से अधिक है. CATO इंस्टीट्यूट के आप्रवासी नीति विशेषज्ञ, डेविड बिएर के अनुसार वर्ष 2030 तक अमरीका में ग्रीन कार्ड का इंतज़ार करने वालों संख्या लगभग 25 लाख तक पहुंच सकती है. अमरीका में रहने के लिए ग्रीन कार्ड का इंतज़ार कर रहे लोगों में से 75 फ़ीसदी, भारतीय हैं. और इनमें से दो लाख लोगों की अर्ज़ियों की मियाद भी ख़त्म होने वाली है. डेविड बियर की तैयार की हुई एक रिपोर्ट के अनुसार ऐसा इसलिए होगा, क्योंकि कई भारतीय आप्रवासी कामगार तो ज़्यादा उम्र होने के चलते, ग्रीन कार्ड पाने से पहले ही चल बसते हैं.

डेविड बियर कहते हैं कि, हुनरमंद लोगों की अमरीका में बहुत मांग है. लेकिन, ऐसे कुशल कामगारों के ग्रीन कार्ड का हिस्सा 1990 के दशक से ही एक लाख चालीस हज़ार के आस पास अटका हुआ है.

डेविड बियर – फाइल फोटो

2018 की एक एक रिपोर्ट के अनुसार, अमरीका में क़रीब 9 लाख 85 हज़ार डॉक्टर प्रैक्टिस कर रहे हैं. इनमें से 23 प्रतिशत यानी 2 लाख 26 हज़ार के क़रीब ऐसे हैं, जो दूसरे देशों से पढ़ाई करके अमरीका आए हैं. और अमरीका में प्रैक्टिस कर रहे दो लाख 26 हज़ार डॉक्टरों में से 23 फ़ीसदी भारतीय मूल के हैं, तो छह प्रतिशत का जन्म पाकिस्तान में हुआ है.

विदेशी डॉक्टरों का अमरीका में योगदान

विदेशों में पढ़ाई करने वाले डॉक्टर, अक्सर या तो H-1B या फिर J-1 वीज़ा पर अमरीका आते हैं. J-1 ग़ैर आप्रवासी वीज़ा होता है, जो उन देशों के नागरिकों को दिया जाता है, जिनके साथ अमरीका का अदला बदली का समझौता है. यानी दोनों देशों के लोग एक दूसरे के यहां पढ़ने और काम करने आ और जा सकते हैं.

डॉक्टर नाहिद उस्मानी, अमरीका में काम करने वाले पाकिस्तानी मूल के डॉक्टरों के संगठन, एसोसिएशन ऑफ़ फ़िज़िशियन्स ऑफ़ पाकिस्तानी डिसेंट इन नॉर्थ अमेरिका (AAPNA)के अध्यक्ष हैं. डॉक्टर उस्मानी कहती हैं, ‘क़ानूनी तौर पर H-1B और J-1 वीज़ा इंटरव्यू व्यक्तिगत स्तर पर किए जाते हैं. लेकिन, कई देशों से अमरीकी दूतावास के अधिकारी अपने देश लौट आए हैं. क़रीब 200 पाकिस्तानी डॉक्टरों को अमरीका में रेज़िडेंट डॉक्टर के तौर पर काम करने के लिए हरी झंडी मिल चुकी है. लेकिन, उन्हें वीज़ा इंटरव्यू का इंतज़ार है. हमने, अमरीकी सरकार से गुज़ारिश की है कि ऐसे लोगों के इंटरव्यू स्काइप या ज़ूम के ज़रिए कर लिए जाएं. वरना वो तय समय पर रेज़िडेंस के लिए अमरीका नहीं आ सकेंगे.’

AAPNA अमरीका और कनाडा में काम कर रहे पाकिस्तानी मूल के लगभग 18 हज़ार डॉक्टरों की नुमाइंदगी करती है. डॉक्टर उस्मानी को डॉक्टरों से अब तक तो ऐसी कोई शिकायत नहीं मिली है कि वीज़ा के नियमों की पाबंदियों की वजह से वो कोरोना वायरस की महामारी से लड़ने में योगदान नहीं दे पा रहे हैं. AAPNA के लगभग एक चौथाई यानी क़रीब साढ़े चार हज़ार डॉक्टर अमरीका के न्यूयॉर्क राज्य में ही रहते हैं. इनमें से दर्जनों डॉक्टर ख़ुद भी कोरोना वायरस से संक्रमित हो गए हैं.

इस बारे में डॉक्टर नाहिद उस्मानी ने अमरीकी अधिकारियों से भी संपर्क किया है. लेकिन, अभी इस दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई है.

डॉक्टर नाहिद उस्मानी – फाइल फोटो

अमरीकी मेडिकल एसोसिएशन ने विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो को एक चिट्ठी लिख कर ये अपील की है कि वो अमरीकी दूतावासों में वीज़ा की प्रक्रिया को दोबारा शुरू कराएं. ख़ास तौर से डॉक्टरों के लिए, ताकि वो जुलाई में शुरू हो रहे अमरीकी अस्पतालों के रेज़िडेंसी कार्यक्रमों में शामिल हो सकें. इसके जवाब में अमरीकी विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने एक अस्पष्ट सा बयान जारी किया है, जिसमें कहा गया है कि वो सबसे ज़रूरी वीज़ा उपलब्ध कराने की दिशा में काम कर रहे हैं.

‘सबसे उम्दा पेशेवर’

अमरीका में काम कर रहे विदेशी स्वास्थ्य कर्मियों को लेकर, हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में हेल्थ पॉलिसी और मेडिसिन के प्रोफ़ेसर डॉक्टर अनुपम जेना ने एक अध्ययन किया था. इस स्टडी में बताया गया था कि अगर अच्छी स्वास्थ्य सेवाओं की बात करें, तो आप्रवासी डॉक्टर, अमरीकी डॉक्टरों के कंधे से कंधा मिला कर देश में इस दिशा में योगदान दे रहे हैं.

इस स्टडी के मुताबिक़ अमरीका आकर रिसर्च करने वाले विदेशी डॉक्टरों ने शानदार अनुसंधान किए हैं. अमरीका में काम करने वाले आप्रवासी डॉक्टरों को बेहद कड़े मुक़ाबले वाले माहौल में ख़ुद को बचाते हुए काम करना पड़ता है. इन आप्रवासी डॉक्टरों की राह में आने वाली क़ानूनी बाधाओं को दूर करने का प्रयास लंबे समय से किया जा रहा है. लेकिन, डोनाल्ड ट्रंप के अमरीका के राष्ट्रपति बनने के बाद से आप्रवासियों को लेकर होने वाली सियासत में नया उबाल आ गया है.

ऐसे में अभिनव सिंह या मिर्ज़ा बेग़ जैसे पेशेवर डॉक्टरों के लिए किसी एक विकल्प का चुनाव करना आसान नहीं है. उनके सामने बड़ी दुविधा ये है कि वो ऐसे ही लाचारी में अमरीका में काम करते रहें, अनिश्चितता के माहौल में जीते रहें या फिर भारत लौट जाएं और ख़ुद के लिए या अपने परिवार के लिए जीने का विकल्प चुनें.

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