Sunday, August 14, 2022

साहस,पराक्रम और बलिदान के 23 साल

साहस,पराक्रम और बलिदान के 23 साल

सर्वप्रथम करगिल विजय दिवस पर भारत माता के उन वीर सपूतों के शौर्य और बलिदान को कोटि-कोटि नमन।

जिन्होंने अपने अदम्य साहस,वीरता और बलिदान के बल पर आज के ही दिन करगिल की दुर्गम पहाड़ियों पर पुनः तिरंगा लहराया था और कारगिल युद्ध की विजय गाथा लिखी थी।

कारगिल युद्ध को हुए 23 साल हो चुके हैं. इस साल हम ‘विजय दिवस’ की 23 वीं वर्षगांठ मना रहे हैं. आज भी कारगिल में देश के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देने वाले वीर योद्धाओं की कुछ बातें रोम-रोम में देशभक्ति की लौ को प्रज्जवलित कर देती हैं. खास कर शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा कि कही पंक्ति “ये दिल मांगे मोर” आज के दिन पूरे देश भर में कारगिल विजय दिवस के अवसर पर उन वीर योद्धाओं के साहस और बलिदान को याद किया जाता है.

दरअसल दोनों देशों के बीच मौखिक समझौते के आधार पर सर्दियों की शुरुआत में दोनों तरफ के सैनिक ऊंची चोटियों पर अपनी पोस्ट छोड़कर निचले इलाकों में आ जाते थे. पाकिस्तान और भारतीय दोनों सेनाएं ऐसा करती थीं. सर्दियों में जब भारतीय सेना चोटियों से नीची उतरी तो पाकिस्तानी सैनिकों और आतंकवादियों ने धोखे से घुसपैठ करके सभी प्रमुख चोटियों को अपने कब्जे में ले लिया था.इसके बाद पाकिस्तानी सैनिक और आतंकवादी अब ऐसी प्रमुख चोटियों पर तैनात थे, जहां से वह भारतीय सेना को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचा सकते थे.भारतीय रणनीतिकार बताते है कि यहां युद्ध लड़ने का मतलब था 1 पाकिस्तानी सैनिक को मारने के बराबर हमारे 10 सैनिकों की मौत हो सकती थी।

इसके लिए भारतीय सेना को अधिक नुकसान से बचाने के लिए सिर्फ एक सप्ताह की छोटी ट्रेनिंग के साथ भारतीय वायुसेना के mig,जगुवार और मिराज विमानों के अलावा ध्रुव, चेतक और mi हेलीकॉप्टरो के साथ ऑपरेशन सफेद सागर अभियान चलाकर ऊँचाई पर जमे पाकिस्तानी सैनिकों को तीतर-बितर कर दिया था।

इस के बाद भारतीय सेना ने घुसपैठियों से अपनी जमीन को खाली कराने के लिए ‘ऑपरेश विजय’ अभियान चलाया था।

यह अभियान 60 दिनों बाद आज ही के दिन हमारी सेना के करीब 550 जांबाजो की शहादत तथा लगभग 1360 परमवीरों की वीरता और 30 हज़ार जवानो के अथक प्रयास से ही कारगिल युद्ध में हमें 26 जुलाई 1999 को अंततः विजय श्री के साथ समाप्त हुई थी..

सच कहूं तो इस महत्वपूर्ण सफलता के लिए हमें सिर्फ भारतीय सेना को ही सारा श्रेय जाना चाहिए,किसी राजनीतिक पार्टी को नही। क्योंकि ना तो हम सेना के बलिदान को सदियों तक भूल पाएंगे ना ही भारतीय राजनीति की तत्कालीन असफलता ही भूली जायेगी.आखिर 550 जाबांजो की मौत(शहादत)का सवाल है..

वैसे यह विडम्बना हमेसा हमें देखने को मिली है कि हमारी राजनीतिक अदूरदर्शिता और अक्रियशीलता की कीमत हमेसा हमारे वीर जवानों ने अपनी जान देकर ही चुकाई है..फिर वो चाहे कारगिल युद्ध हो,या बस्तर की नक्सल समस्या…

कारगिल युद्ध विभित्सीका के बीच पाक-घुसपैठियों की तुलना में भारतीय सैनिकों के पास पहले तो संसाधनों का भयंकर अभाव था। युद्ध के दौरान आपात काल मे गोला बारूद खरीदा गया था। जबकि गोला बारूद सहित सर्दियों में लड़ने के लिए जवानों के पास संसाधनों की भारी कमी की बात सुरक्षा एजेसियां सालों से सरकारों को कह रही थी। परन्तु इस तरफ समय रहते बिना ध्यान दिए ही तत्कालीन सरकार ने जवानों को युद्ध की आग में क्यों झोंक दिया था.?

इसके अलावा कारगिल युद्ध मे इंटलीजेंस फेलुवर भी एक बड़ी महत्वपूर्ण चूक थी। इतनी अधिक संख्या में पाकिस्तानी अतिक्रमण कारी एक दो दिन में घाटी पर कब्जा नही कर सकते थे। यह महीनों चलने वाली प्रक्रिया थी। जिसकी भनक भारतीय सुरक्षा एजेसियों को समय पर क्यों नही लगी? भारतीय सेना को इस घुसपैठ की जानकारी स्थानीय चरवाहों से ही मिली थी.चरवाहों ने पाकिस्तानी सैनिकों और घुसपैठियों को वहां कब्जा करते हुए देख लिया था.
कारगिल युद्ध के बाद निकाले गए परिणामो के आधार पर यह कहा जा सकता है कि भारतीय राजनितिज्ञों की निकृष्टता/सिस्टम में व्याप्त भयंकर भ्रष्टाचार ने हमारी सेना/सुरक्षाबल को हमेसा युद्ध उपयोगी आवश्यक संसाधनों से वंचित रखा है। कारगिल युद्ध के दौरान कॉफिन-घोटाला इस बात का जीवंत प्रमाण है कि हमारे जिम्मेदार लोग सेना की जरूरतों में भी घूसखोरी और दलाली से नही चूकते हैं। जबकि यथार्थ तो यह है कि हमारी सेना/अर्धसेना के जवानों ने 1947,1962,1965,1971,1999 की लड़ाइयों के अलावा अब तक कि तमाम आतंकी/नक्सली हमलों का सामना सिर्फ अपने साहस और उच्च मनोबल के दम पर ही किया हैं।।

पुनः.कारगिल शहीदों को विनम्र श्रद्धांजलि के साथ

……”जय- हिन्द की सेना”……
“कारगिल विजय दिवस की शुभकामनाएं”…

नितिन-सिन्हा

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