Monday, September 26, 2022

क्या आज़ादी का यही अर्थ है?

क्या आज़ादी का यही अर्थ है?

( लेखक – कनक तिवारी )

दुनिया का सबसे बहुसंख्यक लोकतंत्र अपनी आज़ादी की हीरक जयन्ती मना रहा है। 125 करोड़ से अधिक लोगों को मुल्क में लोकतंत्र को घुट्टी की तरह चटाया जा रहा है। दुनिया में आधे देशों में तानाशाहियां ही स्थापित हैं। भारत वैसे विष्व सभ्यता का सबसे पुराना मुल्क है। वह अन्य देषों पर हमला, धर्मांतरण और सैनिक मुठभेड़ से बचता रहा है। हिन्दुओं ने सदियों की मशक्कत के बाद अपनी जीवन षैली को ईजाद किया है। वह इतिहास में एकल और अनोखी है। भारत ने भौतिकता को प्रोन्नत करना लक्ष्य नहीं समझा। आत्मा-विषयक खोज उसका अनोखा एडवेंचर रहा है। पश्चिमी देशों में तो सभ्यता का देर से विकास हुआ। उन्होंने फिर रोल मॉडल समझे जाते भारत के साथ संपर्क या अतिक्रमण का भी रिश्ता बनाना चाहा। यूनानी, यवन, हूण, तुर्क, पठान, मुगल, अंगरेज़, डच, फ्रांसीसी, इतालवी, पुर्तगाली एवं अन्य सभ्यताओं के यायावरों और विस्तारवादियों ने भारत आना जारी रखा। मुगल और अंगरेज़ इस देश में पीढि़यों तक हुकूमत भी करते रहे। सदियों की गुलामी के बाद आज़ाद देश की जन्मतिथि 15 अगस्त 1947 को तकदीर ने अपने हाथों लिखी।

विदेषी गुलामी से मुक्ति को अंगरेज़ी में ‘इंडिपेंडेंस‘ कहा गया। उसका तर्जुमा ‘आज़ादी‘, ‘स्वतंत्रता‘, ‘स्वाधीनता‘, ‘स्वराज‘ जैसे कई शब्दों में होता है। सबसे बड़े राजनीतिक मसीहा गांधी ने ‘स्वराज‘ शब्द का इस्तेमाल किया। उनके लिए आज़ादी का मायने ‘पर‘ से मुक्त होकर ‘स्व‘ का राज था। उसमें एक साथ मुक्ति और खुद मुख्तारी की दोहरी प्रक्रिया शामिल थी। गांधी वाला अर्थ लेकिन किसी को नहीं भाया। उनसे पहले लोकमान्य तिलक ने अंगरेज़ी में नारा दिया था। उसका हिन्दी अनुवाद कहता है ‘स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है।‘ भारत को आज़ादी के अर्थ में स्वतंत्रता ही मिली है। देश का शासन अपना तंत्र गढ़ा गया। यह तंत्र लेकिन वेस्टमिन्स्टर वाली ब्रिटिश पद्धति से अहसानमंद होकर संविधान सभा ने लिया। संविधान, संसद, न्यायपालिका, प्रशासन सहित समाज के कई क्षेत्रों में बर्तानवी गुर्राहट आज भी टर्राती है।

52 देष ब्रिटिश कॉमनवेल्थ के छाते के नीचे खड़े हो गए। स्वतंत्रता में ‘स्व‘ के ऊपर ‘तंत्र‘ भारी है। तंत्र वशीकरण यंत्र बनकर 135 करोड़ भारतीयों को समझाता है पांच वर्षों में एक बार वोट पाने वाले उनके स्थायी मुख्तार हैं। मतदाता अपने प्रतिनिधि में अविश्वास भी करे, तब भी वोट देने का मतलब अपने स्व को कम से कम पांच वर्षों के लिए गिरवी रख देे। ‘स्वाधीन‘ शब्द प्रत्येक नागरिक को अपने ‘स्व‘ के अधीन होना समझाता है। संविधान में इसके बरक्स लिखा है प्रत्येक नागरिक को कई तरह के मूल अधिकार होंगे।

अंगरेज़ों के बाद शक्तिसम्पन्न, अमीर, हिंसक, तिकड़मबाज़ और हिकमती लोग लोकतंत्र की ड्राइविंग सीट पर बैैठ गए हैं। ये हत्या, बलात्कार, नकबजनी, डकैती, आर्थिक घोटाले करते कराते हैं। लोग राज्य शक्ति की धाराओं पर सवाल उठाते हैं कि उनकी आज़ादी छीनी नहीं जा सकती। कुछ रक्त शोषक लोग कोयला, लोहा, वनोत्पाद, जल आदि सरकारी शह पर लूटते हैं। उनकी मोटी तोंदें फुलाने को सरकारें ‘लोकप्रयोजन‘ कहती हैं। वे कानून की किताबों के पन्ने फाड़कर उनसे अपने जूते पोंछते हैं। धन कमाने की अकूत डकैती को ही वे आज़ादी समझते हैं। उनका विरोध करने वालों को देशद्रोही कह देते हैं।

आज़ादी के मूल्य युद्ध में अंगरेज़ों के खिलाफ कई नेता थे। उन्होंने शेर की मांद में घुसकर शेर मारने के गुर सीखे थे। उन्हें विवेकानन्द, गांधी, दयानन्द सरस्वती, अरविन्द, रवीन्द्रनाथ, तिलक, मौलाना आज़ाद, भगतसिंह, चंद्रषेखर आज़ाद, सुभाष बोस, राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश, राजेन्द्र प्रसाद वगैरह कहा जाता है। उनकी आंखों में आंसू के सपने थे जिनके घरों के आसपास मोरियां बजबजाती हैं। जिनकी बेटियां शोहदों द्वारा देश विदेश में बेची जाती हैं। जिनकी देह में खून कम होकर लेकिन पसीना ज़्यादा झरता है। जो किसी सभ्य समाज की बैठक में शरीक होने के लायक नहीं समझे जाते। जो जंगलों में जानवरों की तरह सरकारों और विद्रोहियों दोनों के द्वारा बोटी बोटी काटे जाते हैं। जिन्हें आज़ादी ‘स्व-राज‘ के अर्थ में मिलनी थी उनमें ‘स्व‘ ही नहीं बचा। जिन्हें विवेकानन्द सभ्य अजगर कहते थे। वे ही गांधी के अंतिम व्यक्ति को कीड़े मकोड़े समझकर लील रहे हैं।

जिन्होंने ‘स्व‘ ‘तंत्र‘ गढ़ा, वे गुलछर्रे उड़ा रहे हैं। उन्हें ज़म्हूरियत में विधायक, सांसद और मंत्री कहते हैं। जो अपने ‘स्व‘ के अधीन देश, समाज और कुदरती दौलत पर डकैती कर रहे हैं, उन्हें गौतम अडानी, मुकेश अंबानी, रतन टाटा, अनिल अग्रवाल वगैरह कहते हैं। जो ‘स्व‘ के अधीन रहकर अपना ‘स्व-राज‘ चला रहे हैं। उन्हें आतंकवादी और नक्सलवादी कहते हैं। जिनकी देह से ‘स्व‘ की आत्मा निकाल ली गई है। उन्हें राज तंत्र के अधीन रियाया कहा जाता है। स्वराज, स्वाधीन और स्वतंत्र कुल कुनबे के लोग उन्हें हिकारत से जनता या अवाम भी कहा करते हैं।

जनता का काम है आज़ादी का झंडा लाल किले से लेकर पंचायत भवन और सेठियों के कारखानों में फहराता देखकर अदब से झुक जाए। नौकरशाहों, राजनीतिज्ञों और पूंजीवादी लोकनायकों के सामने उसे अनाज, दूध, फल, दवाइयां, पेट्रोल, खाद, बीज की महंगाइयों तथा भ्रष्टाचार के लिए मुंह पर पट्टी बांध लेना है। उसे याद रखना है कि पुरखों ने इससे भी बदतर हालत में गुलामी को आज़ादी में बदल दिया था। उसे याद नहीं रखना है कि आज़ादी का एक और अर्थ ‘मुक्ति‘ या ‘छुटकारा‘ से भी है। जनता को लालकिले से गली, मुहल्ले तक वायदों का कोलाहल थाली, ताली, घंटी बजाकर सुनना है। सुनते सुनते पीढि़यों के कान भले पक जाएं।

फिर भी आज़ादी का उसके लिए एक मर्मांतक अर्थ तो है। यदि देश आज़ाद नहीं होता तो आज उसे पश्चाताप तो होता।

।। यह आप बीती।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।

सरकारी महाविद्यालय का अध्यापक रहते पंद्रह अगस्त के दिन ‘हम कितने आजाद?‘ विषय पर आयोजित परिसंवाद में विवेकानन्द आश्रम रायपुर के प्रांगण में मैंने सरकारी व्यवस्थाओं पर कड़ी टिप्पणी कर दी थी। मुख्य अतिथि रविशंकर विष्वविद्यालय के कुलपति बंशीलाल पांडे ने अपने भाषण में आग्रह किया कि मुझे नौकरी छोड़ देना चाहिए। कार्यक्रम के अध्यक्ष रायपुर संभाग के आयुक्त ओक ने कहा कि मेरी टिप्पणियों के कारण सरकारी नौकरी से निकाले जाने की नोटिस दिलवाएंगे। कुलपति ने अपने भाषण में मुझे शाप दिया था कि मेरी सरकारी नौकरी शीघ्र ही छूट जाए। आयुक्त ने ऐलान किया कि मैं सरकारी नौकरी से त्यागपत्र नहीं दूंगा तो वे मुझे मेरी टिप्पणियों के कारण नोटिस भिजवाएंगे। मेरे चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी थीं। मेरे हाथों के तोते उड़ गए। पैरों के नीचे से जमीन खिसकने लगी। कार्यक्रम के बाद चाय पीते वक्त मुझे मुरझाया हुआ देखकर स्वामी आत्मानंद ने अपना चिरपरिचित ठहाका लगाया और उनके साथ दोनों अभ्यागतों ने भी। कोई भी अपने प्रस्ताव पर गंभीर नहीं था। वे सब लेकिन चाहते थे कि मुझे सरकारी नौकरी के फ्रेम में जकड़े नहीं रहना चाहिए था। संयोगवश उसके बाद मेरी नौकरी छूट भी गई।

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